
भारत के राष्ट्रीय ध्वज का इतिहास बेहद रोचक और महत्वपूर्ण है। हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक ऐसा तथ्य साझा किया है जो बहुत कम लोगों को पता था।
उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ध्वज समिति ने सर्वसम्मति से पारंपरिक भगवा रंग को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज बनाने की सिफारिश की थी। भगवा रंग भारतीय संस्कृति और धर्म का प्रतीक माना जाता है, जो साहस, बलिदान और त्याग का परिचायक है।
मोहन् भागवत के अनुसार, उस वक्त ध्वज समिति के सदस्यों ने यह निर्णय लिया था कि भगवा ही भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का आधार होगा। लेकिन महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव में हस्तक्षेप किया। गांधी जी ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग होने चाहिए और सबसे ऊपर भगवा रंग होगा। उन्होंने तर्क दिया कि तीन रंगों का होना भारत की विविधता और एकता का प्रतीक होगा। इसके साथ ही, तीन रंगों के माध्यम से भारत की विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक परतों को भी दर्शाया जा सकेगा।गांधी जी के इस सुझाव के बाद, राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंगों को शामिल किया गया – भगवा, सफेद और हरा। भगवा रंग साहस और बलिदान का प्रतीक है, सफेद रंग शांति और सच्चाई का, जबकि हरा रंग समृद्धि और विकास का प्रतिनिधित्व करता है। इनके बीच में अशोक चक्र को भी स्थान दिया गया जो धर्म और न्याय का प्रतीक है।यह निर्णय न केवल राष्ट्रीय ध्वज को एक समग्र और समृद्ध प्रतीक बनाता है, बल्कि भारत की विविधता और एकता का भी संदेश देता है।
महात्मा गांधी की यह समझ और दृष्टिकोण आज भी हमारे राष्ट्रीय ध्वज की पहचान है।इस प्रकार, भगवा रंग को राष्ट्रीय ध्वज का हिस्सा बनाने का श्रेय गांधी जी को ही जाता है, जिन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को तीन रंगों में विभाजित कर एक ऐसा प्रतीक बनाया जो पूरे देश को गर्व महसूस कराता है। मोहन भागवत के इस बयान से हमें भारतीय ध्वज के इतिहास की एक नई और महत्वपूर्ण जानकारी मिली है, जो हमारे राष्ट्रीय गौरव को और भी बढ़ाती है।
