
अनुच्छेद 26 की सुरक्षा “religious denomination” जैसे शब्द पर टिकी है, जो ईसाई-पश्चिमी सोच से उपजा है और हिंदू धर्म की बहुलता व लचीलेपन पर लागू नहीं होता। नतीजतन, हज़ारों हिंदू मंदिर और धार्मिक समुदाय संवैधानिक संरक्षण से वंचित रह जाते हैं। धर्म की जननी भूमि पर ही उसके मूल स्वरूप को दबाया जा रहा है, क्योंकि हमारी धार्मिक स्वतंत्रता को ऐसे पैमाने से आँका जा रहा है जो हमारे दर्शन और आचरण से मेल नहीं खाता।

अनुच्छेद 26 की सुरक्षा “religious denomination” जैसे शब्द पर आधारित है, जो ईसाई-पश्चिमी सोच से आया है और हिंदू धर्म की विविधता को नहीं समझता।
ज़्यादातर हिंदू परंपराओं में कोई ठोस संगठनात्मक ढांचा नहीं होता, इसलिए वे इस परिभाषा में फिट नहीं होते और कानूनी संरक्षण से वंचित रह जाते हैं।
भारत के दो-तिहाई हिंदू किसी एक पंथ से नहीं जुड़े हैं, फिर भी वे धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं — पर उन्हें अनुच्छेद 26 के अधिकार नहीं मिलते।
ईसाई संस्थाओं को पूरी संवैधानिक सुरक्षा मिलती है, लेकिन अधिकतर हिंदू मंदिर — खासकर स्वतंत्र और स्थानीय — सरकारी नियंत्रण में हैं, क्योंकि व्याख्या एकतरफा है।
न्याय के लिए ज़रूरी है कि अनुच्छेद 26 की व्याख्या भारत की सनातन परंपरा और हिंदू दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर हो, ताकि हर आस्था और आध्यात्मिक मार्ग को समान हक़ मिल सके।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक मामलों को स्वतंत्र रूप से संचालित करने का अधिकार दिया गया है — लेकिन यह अधिकार सिर्फ़ उन्हीं को मिलता है, जिन्हें “धार्मिक संप्रदाय” माना जाता है। सुनने में तो यह व्यवस्था ठीक-ठाक ही लगती है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसका इस्तेमाल अक्सर हिंदू समाज के अधिकारों को छीनने के लिए किया गया है।“धार्मिक संप्रदाय” की जो परिभाषा अपनाई गई है, वह ज़्यादातर ईसाई-पश्चिमी सोच पर आधारित है,[1] जो भारत की विविध और जटिल धार्मिक परंपराओं पर फिट नहीं बैठती। अब्राहमिक धर्मों के मानदंडों पर आधारित “धार्मिक संप्रदाय” की इस बेहद संकीर्ण परिभाषा को जब हिंदू धर्म पर लागू किया जाता है, तो नतीजा यह निकलता है कि यह परिभाषा उसकी विविध परंपराओं के साथ न्याय नहीं कर पाती, और न ही हिंदू धर्म की आध्यात्मिक विशिष्टताओं की बारीकियों को समझ पाती है। इसका नतीजा अंततः यह निकलता है कि हिंदू धर्म के बहुत से अनुयायी और उनके पंथ (संप्रदाय) अनुच्छेद 26 के तहत मिलने वाले अधिकारों से वंचित रह जाते हैं।
वर्तमान परिवेश में अनुच्छेद 26 की एक नये सिरे से व्याख्या करने की ज़रूरत है, एक ऐसी व्याख्या जो इसे भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुरूप पुनः परिभाषित करे। लेकिन ऐसा करना महज़ एक कानूनी ज़रूरत नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा हेतु एक बेहद आवश्यक कदम है।
अनुच्छेद 26 की एकतरफ़ा व्याख्या और हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 कहता है:सार्वजनिक व्यवस्था, और नैतिकता के अधीन रहते हुए, हर धार्मिक संप्रदाय या उसका कोई भी हिस्सा इन अधिकारों का हकदार होगा—
a) धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए संस्थाओं की स्थापना और संचालन करने का;
b) धर्म से जुड़े मामलों में अपने कार्यों का खुद प्रबंधन करने का;
c) चल और अचल संपत्ति रखने और अर्जित करने का;
d) ऐसी संपत्ति का क़ानून के अनुसार प्रबंधन करने का।
जहाँ अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक समूहों को सामूहिक रूप से अपने धर्म का पालन करने, संस्थाएँ स्थापित करने, संपत्ति का प्रबंधन करने, और बिना किसी बाहरी दखल के अपने धार्मिक मामलों को चलाने व अपने धर्म का पालन करने का अधिकार प्रदान करता है।[2]यह अनुच्छेद धार्मिक संप्रदायों को इस मामले में स्वायत्तता देता है कि वे अपने अंदरूनी धार्मिक मामलों का संचालन खुद करें — बशर्ते यह स्वायत्तता सार्वजनिक व्यवस्था, और नैतिकता के दायरे में रहे। परन्तु इस अनुच्छेद का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है, जब ‘धार्मिक संप्रदाय’ शब्द का मतलब सही तरीके से समझा और परिभाषित किया जाए। इसलिए अनुच्छेद 26 के तहत दिए गए अधिकारों और संरक्षणों का पूर्ण लाभ उठाने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि भारतीय संदर्भ में इस शब्द की व्यापक और सटीक व्याख्या की जाए।
हिंदू परंपराओं को पश्चिमी नज़रिए से आंकना:
एक संवैधानिक अन्यायभारतीय संविधान में ‘धार्मिक संप्रदाय’ (religious denomination) शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने 1954 के शिरूर मठ केस में इस शब्द की व्याख्या ऑक्सफर्ड डिक्शनरी के आधार पर की।[3] उस परिभाषा के अनुसार, किसी संप्रदाय के पास एक विशिष्ट नाम, एक समान आस्था, और एक संगठित ढांचा होना चाहिए।[4] यह परिभाषा मूलतः ईसाई धार्मिक व्यवस्था को दर्शाती है, जहाँ कैथोलिक, एंग्लिकन या मेथोडिस्ट जैसे संप्रदाय एक केंद्रीकृत और विशिष्ट ढांचे के अनुसार संचालित होते हैं। ऐसी व्यवस्था में आमतौर पर हर संप्रदाय की नियम-प्रणाली और परंपराएँ एक दूसरे से बिलकुल अलग होती हैं, और संप्रदायों में कोई आपसी आदान-प्रदान नहीं होता। लेकिन हिंदू धर्म का स्वरूप बिल्कुल अलग है — यह एक जीवंत, विविध और बहुलतावादी परंपरा है, जहाँ अनेक दर्शन, आस्थाएँ और पंथ एक साथ सह-अस्तित्व में रहते हैं।
इसलिए सिर्फ़ ऑक्सफर्ड डिक्शनरी पर आधारित परिभाषा अपनाकर हमारी अपनी धार्मिक परंपराओं, ग्रंथों और व्यावहारिक विविधताओं को नज़रअंदाज़ करना न केवल भ्रामक है, बल्कि यह हिंदू धर्म के स्वाभाविक और गतिशील स्वरूप के प्रति एक गहरा अन्याय भी है।
ईसाई धर्म में हर संप्रदाय की एक बिलकुल स्पष्ट परिभाषा होती है, और सभी संप्रदायों का पारंपरिक स्वरूप एक दूसरे से बिलकुल अलग होता है। कोई व्यक्ति या तो एंग्लिकन होता है, या मेथोडिस्ट, या फिर कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, इत्यादि— और आमतौर पर वह सिर्फ़ अपने ही संप्रदाय के पूजा-स्थल में जाता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो, ईसाई संप्रदायों की संरचना hierarchy यानि ऊँच-नीच की व्यवस्था पर आधारित होती है, आस्था और सिद्धांतों में बंधी होती है, और भौगोलिक रूप से भी विभाजित रहती है। ये संप्रदाय आमतौर पर एक विशिष्ट पहचान के साथ काम करते हैं, जिनमें केंद्रीकृत नियंत्रण व एक जैसी मान्यताएँ होती हैं। उदाहरण के तौर पर, एक कैथोलिक व्यक्ति आमतौर पर प्रोटेस्टेंट चर्च की प्रार्थना सभा में नहीं जाता, और इसी तरह से एक प्रोटेस्टेंट ईसाई प्रायः कैथोलिक चर्च की प्रार्थना सभा में भाग नहीं लेता। इन धार्मिक संस्थाओं के पास लिखित सिद्धांत, केंद्रीकृत प्रशासन, और तयशुदा धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जिससे उस संदर्भ में ‘धार्मिक संप्रदाय’ की पहचान करना तार्किक रूप से आसान हो जाता है।
हिंदू धर्म में “religious denomination” यानी किसी “धार्मिक पंथ” के सबसे निकटतम समानार्थी शब्द को “संप्रदाय” कहा जा सकता है। लेकिन हिंदू धर्म के संप्रदाय ईसाई धर्म के संप्रदायों से बिलकुल भिन्न होते हैं। ये संप्रदाय पत्थर की लकीर नहीं होते। समय के साथ-साथ इन परंपराओं में नये आयाम जोड़े जा सकते हैं। इसके साथ ही हिंदू धर्म के संप्रदाय गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित होते हैं। इनकी संरचना और रूपरेखा ईसाई संप्रदायों की भाँति अडिग नहीं होती, इनमें नये विचारों को आत्मसात करने की, और परिवर्तन की काफ़ी संभावनायें रहती हैं। हिंदुओं के धार्मिक संप्रदाय समावेशी भी होते हैं, यानी इनमें परस्पर आदान प्रदान की बहुत गुंजाइश रहती है। गुरु-शिष्य परंपरा कई हिंदू संप्रदायों की पहचान का मूल आधार होती है। ये संप्रदाय अक्सर एक ही समुदाय या परिवार के भीतर साथ-साथ अस्तित्व में रहते हैं, और एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं।
उदाहरण के लिए, वैष्णव परंपरा के भीतर ही अनेकों संप्रदाय हैं—जैसे श्री संप्रदाय, माधव संप्रदाय, और गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय—जिनकी अपनी-अपनी दर्शन और पूजा-पद्धतियाँ हैं। फिर भी इनके अनुयायी एक-दूसरे को अलग या बाहरी नहीं मानते। इसी तरह, देवी की उपासना करने वाला व्यक्ति वैष्णव त्योहारों में भी भाग ले सकता है। हिंदू धर्म में किसी एक देवता या परंपरा के प्रति पूर्ण निष्ठा (exclusive allegiance) की कोई अनिवार्यता नहीं होती। सबसे ज़रूरी बात यह है कि इस विविधता और परिवर्तनशीलता को सनातन धर्म कोई कमज़ोरी नहीं मानता, बल्कि इसे अपनी एक ताकत के रूप में देखता है।
अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो ईसाई धर्म में “denomination” और हिंदू धर्म में “संप्रदाय “—ये दोनों अवधारणाएँ मूल रूप से अलग हैं, और एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं। ईसाई संप्रदाय एक केंद्रीकृत धार्मिक ढांचे के भीतर स्थित एक स्पष्ट, सीमित और विशिष्ट गुट को दर्शाते हैं, जबकि हिंदू संप्रदाय एक ढलने की क्षमता और दार्शनिक परंपरा को दर्शाते हैं, जो एक ऐसी आध्यात्मिक खोज की विरासत पर आधारित होती है, जिसे कोई भी केन्द्रीकृत ढाँचे नियंत्रित नहीं करते।
हिंदू धर्म व्यक्तिगत भक्ति, ईश्वर को जानने के अनेक मार्गों, और विविध आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने की स्वतंत्रता पर आधारित है—वह किसी संस्थागत बंधन में नहीं बंधता। ईसाई धर्म के सख्त सांप्रदायिक ढांचे के विपरीत, हिंदू संप्रदायों में एक अद्भुत परिवर्तनशीलता होती है, जहाँ व्यक्ति एक से अधिक परंपराओं से जुड़ सकता है, और बिना किसी बंधन के एक संप्रदाय से दूसरे, दूसरे से तीसरे, और फिर वापस पहले में अपनी आस्थानुसार सहज रूप से आ जा सकता है।[7]
भारत के हिंदू परिवारों में यह सामान्य बात है कि एक ही घर में अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा होती है, और उनकी साधना या तो विभिन्न संप्रदायों से जुड़ी होती है, या फिर किसी भी औपचारिक संप्रदाय का हिस्सा नहीं होती।[8] सच्चाई तो यह है कि हिंदुओं की आबादी का लगभग दो-तिहाई हिस्सा स्वयं को किसी विशिष्ट संप्रदाय से जोड़कर नहीं देखता।[9] लेकिन हिंदुओं के इस आध्यात्मिक लचीलेपन को उनकी धार्मिक अपरिपक्वता मानना एक बड़ी भूल होगी। बल्कि, यह तो हिन्दू दृष्टिकोण में निहित गहरे बहुलवाद और आध्यात्मिक स्वतंत्रता की परंपरा को दर्शाता है।
लेकिन यही समायोजन क्षमता — जो हिंदू धर्म की आत्मा और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है — जब कानूनी और प्रशासनिक ढाँचों की बात आती है, तो इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन जाता है। इसके पीछे की वजह यह है कि इन ढांचों की नींव अब्राहमिक सोच से प्रभावित मानकों पर रखी गई है, जो हिंदू परंपराओं की प्रकृति से मेल नहीं खाते। भारतीय न्यायपालिका का रवैया इस समस्या को और भी अधिक जटिल बनाता है, जो आज भी ‘धार्मिक संप्रदाय’ जैसे शब्दों की व्याख्या एक सख्त, चर्च-केन्द्रित, और पश्चिमी धर्मशास्त्र पर आधारित दृष्टिकोण से करती है।[10] भारतीय सभ्यता और इसकी परंपराओं की गहराई को समझने के बजाय, हमारी अदालतें अब भी औपनिवेशिक काल की परिभाषाओं का सहारा लेती हैं — जो हिंदू संदर्भ के लिए न केवल अनुपयुक्त हैं, बल्कि हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के दृष्टिकोण से अक्सर अन्यायपूर्ण भी साबित होती हैं।
इस औपनिवेशिक सोच की छाया जब संवैधानिक व्याख्या पर पड़ती है, तो उसका सीधा असर हिंदू समुदायों के अधिकारों पर होता है। इसके फलस्वरूप हिंदुओं के अधिकार आज भी अनेकों शर्तों के दायरे में बंधे हुए हैं, और एक योजनाबद्ध ढंग से लगातार कमज़ोर बनाये जाते रहे हैं। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि अधिकांश हिंदू जो किसी विशेष संप्रदाय से नहीं जुड़े हैं — उन्हें अनुच्छेद 26 के संरक्षण के दायरे से स्वतः ही बाहर कर दिया जाता है। जब तक भारत की सभ्यतागत और आध्यात्मिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 26 की व्याख्या नहीं की जाती, तब तक हिंदू समुदायों के अधिकारों की अनदेखी होती रहेगी। यह केवल एक कानूनी समस्या नहीं है, बल्कि एक गहरा सभ्यतागत विरोधाभास है — जो संवैधानिक निष्पक्षता के आवरण में दरअसल औपनिवेशिक सोच को क़ायम रखता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता जे. साई दीपक ने सबरीमाला फैसले को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिका की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान बिल्कुल सटीक तर्क दिया : “…अनुच्छेद 26 के हिंदी संस्करण में प्रयुक्त ‘संप्रदाय’ शब्द भारतीय संदर्भ में धार्मिक पंथों को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है, जबकि ‘denomination’ शब्द विशुद्ध रूप से ईसाई धर्म से जुड़ा हुआ है, और इसलिए हिंदू संप्रदायों को समझने के लिए उसका उपयोग नहीं किया जा सकता…”[11]
अनुच्छेद 26 के संरक्षण से कैसे हिंदुओं को वंचित रखा जाता है
अनुच्छेद 26 की इस भ्रामक और पक्षपातपूर्ण व्याख्या का सबसे स्पष्ट और चिंताजनक नतीजा है — हिंदू मंदिरों पर सरकार का लगातार नियंत्रण। यदि कोई मंदिर किसी औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त मठ या धार्मिक संस्था के अधीन नहीं आता, तो उसे अनुच्छेद 26 के संरक्षण का पात्र ही नहीं माना जाता।
अब सबरीमाला मंदिर का मामला ही ले लीजिए।[12] सुप्रीम कोर्ट ने अय्यप्पा भक्तों को ‘धार्मिक संप्रदाय’ मानने से इनकार कर दिया, और इस तरह उन्हें अनुच्छेद 26 के तहत मिलने वाले संवैधानिक संरक्षण से वंचित कर दिया। अदालत का तर्क यह था कि अय्यप्पा परंपरा के पास कोई संरचित सिद्धांत (structured doctrine) या पदानुक्रमिक पुजारी व्यवस्था (hierarchical clergy) नहीं है — इसलिए इसे एक स्वतंत्र धार्मिक संप्रदाय नहीं माना जा सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला धार्मिक आस्था की कसौटी पर ज़रा भी खरा उतरता नहीं दिखता। सदियों से चली आ रही एक परंपरा जिसमें 41 दिन की व्रत साधना (व्रतम), ब्रह्मचर्य का पालन, और विशिष्ट तीर्थयात्रा जैसी कठिन साधनाएँ शामिल हैं, ऐसी समृद्ध परंपरा के बावजूद, इन भक्तों को अपनी धार्मिक परंपरा को बनाए रखने का मौलिक अधिकार नहीं दिया गया।[13]
अधिवक्ता आनंद प्रसाद की एक सटीक मिसाल[14] अनुच्छेद 26 की वर्तमान व्याख्या में निहित विडंबना को बखूबी उजागर करती है। वे चित्रापुर सारस्वत ब्राह्मणों का उदाहरण देकर यह दिखाते हैं कि किस तरह आज की संवैधानिक समझ हिंदू आस्था की ज़मीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुकी है। चित्रापुर सारस्वत ब्राह्मण एक विशिष्ट मठ — कर्नाटक के शिराली में स्थित चित्रापुर मठ — से जुड़े हुए हैं। मौजूदा कानूनी व्याख्या के अनुसार, इस समुदाय के लोग सिर्फ़ उसी मठ के संदर्भ में अनुच्छेद 26 के अधिकारों का दावा कर सकते हैं। लेकिन अगर इसी समुदाय का कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से किसी देवी के मंदिर, या किसी अन्य ऐसे मंदिर से गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक जुड़ाव रखता है, जो उस मठ से जुड़ा हुआ नहीं है, तो उस मंदिर के संरक्षण या प्रबंधन को लेकर उसके पास अनुच्छेद 26 के तहत कोई क़ानूनी अधिकार नहीं हैं, चाहे उसकी श्रद्धा कितनी भी प्राचीन, गहन और निरंतर क्यों न हो।
इसका अर्थ यह है कि न्यायपालिका अब भक्ति और आस्था को मान्यता नहीं देती।अनुच्छेद 26 के अंतर्गत वह केवल यह देखती है कि याचनाप्रार्थी किसी ऐसे समूह से जुड़ा है या नहीं जो मौजूदा परिभाषा के अनुसार ‘धार्मिक संप्रदाय‘ कहलाने के योग्य हो। अगर याचनाप्रार्थी की आध्यात्मिक निष्ठा सख़्त संस्थागत मानदंडों से मेल नहीं खाती, तो उसे पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, फिर चाहे वह निष्ठा उसकी जीवनभर की आध्यात्मिक पूँजी ही क्यों न हो।
आनंद प्रसाद धार्मिक संप्रदाय की संवैधानिक परिभाषा के इसी विरोधाभास को समस्या की जड़ मानते हैं। उनके अनुसार कानून हिंदुओं को उस संस्था की रक्षा का अधिकार देता है, जिससे उनका शायद ही कोई आत्मिक या आध्यात्मिक जुड़ाव हो, लेकिन उन्हें उस मंदिर और परंपरा की रक्षा का हक़ नहीं देता, जिससे उनका वास्तविक और गहरा संबंध है।
अधिकारों की यह अजब हेरफेर— जहाँ संवैधानिक संरक्षण व्यक्ति की जीती-जागती श्रद्धा के बजाय केवल संस्थागत ढांचे पर आधारित होता है — साफ़ दिखाता है कि कैसे अनुच्छेद 26 उन अनगिनत हिंदुओं के लिए लगभग अप्रभावी हो चुका है, जो औपनिवेशिक सोच से प्रभावित हो गढ़ी गई “धार्मिक संप्रदाय” की परिभाषा में फिट नहीं बैठते।
इसी तरह, कई आदिवासी हिंदू समुदाय और ऐसे हिंदू जो हाशिए पर जीवन जीने को मजबूर हैं, उनके धार्मिक अधिकारों को भी उपयुक्त क़ानूनी संरक्षण नहीं मिलता। ऐसे समुदाय अक्सर स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, और इनकी धार्मिक परंपराएँ भी लिखित रूप से संहिताबद्ध यानी codified नहीं होतीं, बल्कि मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती हैं। इन समुदायों का कोई औपचारिक मठ या संरचित संप्रदाय भी नहीं होता। नतीजतन, ये समुदाय भी अनुच्छेद 26 के तहत गारंटीकृत सामूहिक धार्मिक अधिकारों का दावा करने से वंचित रह जाते हैं। आस्था, परंपरा और पूजा पद्धतियों की निरंतरता होने के बावजूद, वे कानूनी मान्यता से मात्र इसलिए वंचित रह जाते हैं, क्योंकि उनका धार्मिक ढांचा औपचारिक या संस्थागत नहीं है।
आज के भारत में — जहाँ अंतर-जातीय और अंतर-समुदाय विवाहों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है, और आध्यात्मिक साधनाएँ जाति और संप्रदाय की सीमाओं से परे जाकर विकसित हो रही हैं — यह मानना कि अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसी व्यक्ति का एक औपचारिक ‘धार्मिक संप्रदाय’ का हिस्सा होना ज़रूरी है, न सिर्फ़ एक घिसी पिटी रूढ़िवादी सोच है, बल्कि साफ़ तौर पर निरर्थक और हास्यास्पद भी है।[15] सरकार द्वारा उन मंदिरों पर नियंत्रण बनाए रखना जो किसी मठ या संस्थागत संप्रदाय से नहीं जुड़े हैं — और साथ ही हिंदू संस्थानों पर अनुच्छेद 26 का चयनात्मक रूप से लागू किया जाना — केवल अन्यायपूर्ण ही नहीं, बल्कि स्पष्ट तौर पर एक दोहरा मापदंड है। हिंदू धर्म पर ईसाई धर्म की ‘religious denomination’ जैसी अवधारणा थोपना, उसकी सभ्यतागत गहराई को नकारने के बराबर है। यह धार्मिक मामलों की एक बेहद सतही और सरलीकृत व्याख्या है, जो हिंदू धर्म की सांस्कृतिक और सभ्यतागत गहराई को सिरे से नकारती है।
हिंदू धर्म की संरचना मूलतः विकेन्द्रीकृत है यानी इसका कोई ऐसा केंद्रीय ढाँचा या नियमावली नहीं है जिसका अनुसरण करने के लिए सभी हिंदू बाध्य हों। इसमें विविध सम्प्रदाय, और व्यक्तिगत साधना के मार्ग निहित हैं। साथ ही इसमे दार्शनिक समायोजन क्षमता भी है, जिसे चर्च जैसे सख्त ढांचों में बाँधना न तो संभव है, और न ही उचित। हमें ज़रूरत है कि हम ईसाई या अब्राहमिक मॉडलों की कानूनी नकल न करें, बल्कि ‘धार्मिक संप्रदाय’ की एक मूलतः भिन्न और धर्मसम्मत व्याख्या विकसित करें — जो भारत की अपनी सभ्यता, परंपरा और धार्मिक विविधता को सही रूप से प्रतिबिंबित करे, न कि उसे विदेशी ढाँचों में जबरन फिट करने की कोशिश करे।
हिंदू परंपराओं के संदर्भ में आर्टिकल 26 को पुनः परिभाषित करने की ज़रूरत‘
धार्मिक संप्रदाय’ (religious denomination) की संवैधानिक व्याख्या को एक नए सिरे से पुनः परिभाषित करने की ज़रूरत है. इस शब्द की क़ानूनी व्याख्या हिंदू धर्म की सभ्यतागत विरासत और उसके आध्यात्मिक सार को ध्यान में रखकर होनी चाहिये। संविधान की व्याख्या औपनिवेशिक सोच या ईसाई धर्मशास्त्र के नज़रिए से नहीं की जानी चाहिए। इसकी जगह भारतीय अदालतों को भारतीय ज्ञान परंपराओं से जुड़कर, एक ऐसी क़ानूनी सोच अपनानी चाहिए जो हमारी संस्कृति में रची-बसी हो, और हर परंपरा को समान रूप से स्थान देने वाली हो।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि संविधान का हिंदी संस्करण “religious denomination” के लिए “संप्रदाय” शब्द का प्रयोग करता है। और “संप्रदाय” शब्द काफ़ी हद तक हिंदू धार्मिक परंपराओं की बारीकियों को प्रतिबिंबित कर पाता है, जबकि “religious denomination” शब्द हिंदू धर्म की सूक्ष्मताओं और गहराइयों को चिन्हित करने में असफल रहता है।
मोनियर-विलियम्स की संस्कृत डिक्शनरी जैसे शास्त्रीय स्रोतों में संप्रदाय को उस आध्यात्मिक परंपरा, मत, या गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में परिभाषित किया गया है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती है।[16] यह व्याख्या हिंदू आध्यात्मिक परंपरा की उस जीवंत और लचीली प्रकृति को दर्शाती है, जो संस्थागत दायरों की क़ैद से बाहर है।
अगर न्यायपालिका ने संविधान के हिंदी संस्करण और उसमें निहित भारतीय आध्यात्मिक विरासत की सूक्ष्मता और गहराई पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया होता, तो उनके निष्कर्ष शायद बिल्कुल अलग होते। हिंदी संस्करण की अनदेखी करके, न्यायालयों ने शायद एक ऐसा ढांचा अपनाया जो संविधान की सभ्यतागत भावना के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता।
एक अहम सवाल है कि क्या सिर्फ इसलिए कि संविधान के अनुच्छेद 394A(2) में लिखा है कि हिंदी अनुवाद का अर्थ अंग्रेज़ी वाले से मेल खाना चाहिए, हम “religious denomination” जैसे औपनिवेशिक शब्द को “संप्रदाय“ जैसे गहरे और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शब्द पर हावी होने दें?[17] या फिर हमें संप्रदाय को उसके मूल भारतीय अर्थ में समझना चाहिए — यानी उसकी व्याख्या उसी रूप में करनी चाहिये, जिस रूप में वह हिंदू धर्म की संरचना और परंपरा के भीतर स्वाभाविक रूप से कार्य करता है।
हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों के संरक्षण की दृष्टि से अनुच्छेद 26 के तहत पूछा जाने वाला सबसे अहम सवाल यह नहीं होना चाहिए कि — “क्या कोई हिंदू किसी मान्यता प्राप्त संप्रदाय से जुड़ा है?” बल्कि यह होना चाहिए — “क्या उस हिंदू का किसी परंपरा, मंदिर, संस्था या देवी-देवता से वास्तविक और आत्मिक संबंध है?” अगर हाँ, तो फिर उस व्यक्ति को अनुच्छेद 26 के अंतर्गत अधिकार मिलने ही चाहिए। यह अधिकार उन बाहरी लोगों को नहीं मिलना चाहिए, जिनका न तो उस परंपरा से कोई संबंध है, और न ही कोई आध्यात्मिक जुड़ाव — चाहे वे खुद को ‘भले लोग’ या ‘good Samaritan’ ही क्यों न कहें। लेकिन जिन श्रद्धालुओं का उस परंपरा या मंदिर से सच्चा संबंध है, उन्हें इस अनुच्छेद के अंतर्गत पूरी सुरक्षा मिलने चाहिए, भले ही उनकी आस्था पश्चिमी धार्मिक ढांचे के मानकों में फ़िट न बैठती हो।[18]
अनुच्छेद 26 संविधान की एक व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है। धर्म कोई सरकारी कागज़ी व्यवस्था नहीं है — यह आत्मा से जुड़ी हुई एक गहरी आध्यात्मिक भावना है, जिसे किसी organizational chart के माध्यम से समझा नहीं जा सकता। वकील आनंद प्रसाद ने बहुत सटीक रूप से कहा है:[19] “अगर मान लीजिए अनुच्छेद 25 और 26 हटा भी दिए जाएँ, तब भी धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत ज्यों का त्यों रहेगा, क्योंकि अपने धार्मिक मामलों का संचालन करने की आज़ादी भी ‘निजी स्वतंत्रता’ (personal liberty) के व्यापक अर्थ में ही आती है।” न्यायपालिका को यह बात समझनी होगी कि अनुच्छेद 25 और 26, अनुच्छेद 21 — यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार — से गहराई से जुड़े हुए हैं।
आध्यात्मिक स्वतंत्रता, पूजा करने का अधिकार और अपने धार्मिक मामलों का संचालन करने का हक — ये सब व्यक्तिगत स्वतंत्रता (personal liberty) के मूल तत्व हैं। अपने विश्वास का पालन करने की आज़ादी, धार्मिक संस्थाओं को संचालित करने का अधिकार, और पवित्र परंपराओं को संजोए रखने की स्वतंत्रता — ये सभी अनुच्छेद 21 में गहराई से निहित हैं। जिस तरह निजता का अधिकार और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का हक व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा माने जाते हैं, उसी तरह धार्मिक स्वतंत्रता और अपने आध्यात्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार भी व्यक्ति की स्वतंत्रता का एक अनिवार्य पहलू होना चाहिए।
यह समझना बेहद ज़रूरी है कि अनुच्छेद 25 और 26, जो धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता की रक्षा करते हैं, उनकी संवैधानिक व्याख्या भी उतनी ही गहराई और सूक्ष्मता से होनी चाहिये, जिस बारीकी और गहराई से अनुच्छेद 21 की व्याख्या की गयी है।[20] जहाँ एक ओर अनुच्छेद 21 को न्यायपालिका ने समय के साथ व्यापक और गहन व्याख्या के ज़रिए मजबूत किया है, वहीं अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या में उस तरह की गहराई और दूरदर्शिता देखने को नहीं मिलती। अब इस बात को लेकर धीरे धीरे समझ बढ़ रही है की इन महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या उतनी गंभीरता से नहीं की गयी है, और इन्हें परिभाषित करने में वैसी संवेदनशीलता नहीं दिखाई गयी है, जैसी कि अपेक्षा थी, ख़ासकर हिंदुओं की धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में।
अगर संविधान की आत्मा का वास्तव में सम्मान करना है, तो अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या उदार दृष्टिकोण से, और भारत की सभ्यतागत व आध्यात्मिक विरासत की गहराई को समझते हुए की जानी चाहिए। ये प्रावधान महज़ कानूनी औपचारिकताएँ नहीं हैं — बल्कि ये भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की आत्मा की रक्षा करने वाले मूलभूत संवैधानिक स्तंभ हैं।
समापन
हिंदू धर्म की केवल उन्हीं धार्मिक संस्थाओं को अनुच्छेद 26 के अंतर्गत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, जो किसी मठ या संगठित धार्मिक संस्था से सीधे तौर पर जुड़ी हैं। इसका परिणाम यह है कि हज़ारों हिंदू मंदिर — जो स्वतंत्र हैं या किसी मठ, संस्था या संगठित निकाय द्वारा स्थापित नहीं किए गए हैं — उन्हें अनुच्छेद 26 के तहत कोई स्पष्ट संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिलती। “धार्मिक संप्रदाय” शब्द की वर्तमान व्याख्या हिंदू संप्रदायों और मंदिरों को हाशिए पर डालती है, उन्हें समान अधिकारों से वंचित करती है, और सरकार द्वारा पवित्र स्थलों में हस्तक्षेप की नीति को वैध बनाती है। यह सिर्फ एक कानूनी खामी नहीं, बल्कि एक गहरी सभ्यतागत अवहेलना है — जहाँ करोड़ों हिंदुओं की जीवंत, विविध और बहुरूपी आस्था को एक ऐसे कानूनी ढांचे के तहत अदृश्य बना दिया गया है जो हिंदू धर्म की बहुल, लचीली और विकेंद्रित प्रकृति को समझने में असमर्थ है।
जिस देश की नैतिकता और दर्शन की जड़ें धर्म में गहराई से समाई हों, उसके लिए यह किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकता कि उसके स्वदेशी आध्यात्मिक अधिकारों की व्याख्या औपनिवेशिक मानसिकता तय करे। अनुच्छेद 26 को हिंदू धर्म की बहुलता, संप्रदायों की विविधता, और धर्म आधारित जीवन दृष्टि के आलोक में एक नये सिरे से समझने और परिभाषित करने की तत्काल आवश्यकता है। यह सिर्फ एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है।
जैसा कि ऋग्वेद में कहा गया है:[21] : “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” — “सत्य एक है, ऋषि उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।” यह शाश्वत ज्ञान हिंदू धर्म की आत्मा को दर्शाता है — एक ऐसी सभ्यता जो विविधता को विभाजन नहीं, बल्कि धर्म के ढांचे के भीतर बसी आध्यात्मिक एकता और उदारता की जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में अपनाती है। लेकिन दुर्भाग्यवश, यही विविधता — जो कभी हमारी सभ्यतागत शक्ति की पहचान थी, आज इसे लेकर कई तरह की भ्रांतियाँ फैल रही हैं। उसके पीछे की वजह यह है कि वर्तमान समय की न्यायिक व्याख्याएँ भारत की आध्यात्मिक परंपरा को अक्सर पश्चिमी धर्मशास्त्रीय सोच के चश्मे से देखती हैं। इसका नतीजा यह निकलता है कि कई हिंदू संप्रदायों को अनुच्छेद 26 के तहत “धार्मिक संप्रदाय” के रूप में मान्यता पाने के लिए बहुत ज़्यादा संघर्ष करना पड़ता है — इसलिए नहीं कि उनमें आस्था या आध्यात्मिकता की कोई कमी है, बल्कि इसलिए कि धार्मिक आस्था को जाँचने परखने वाला क़ानूनी नज़रिया ही हिंदू परंपराओं की जीवंत, विविध और विकेंद्रित प्रकृति के अनुरूप नहीं है।
यह विरोधाभास इस बात को दर्शाता है कि हिंदू धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में अनुच्छेद 26 की एक नये सिरे से व्याख्या करने की ज़रूरत है। हिंदू धर्म के मूल स्वरूप के प्रकाश में “धार्मिक संप्रदाय” की क़ानूनी व्याख्या का एक ऐसा मूल्यांकन होना चाहिये जो यह स्वीकार करे कि हिंदू जीवन की धार्मिक आस्था एक गहरे व्यक्तिगत, लचीले और विविध अनुभव के रूप में अभिव्यक्त होती है, और हमेशा धर्म की जड़ों से गहराई से जुड़ी रहती है। अगर हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में अनुच्छेद 26 का वास्तव में कोई अर्थ है, तो उसे भक्तों और ईश्वर के बीच के इस पवित्र, आत्मीय और बेहद निजी संबंध की रक्षा करनी होगी, बजाय इसके कि भक्तों को इसलिए दंडित किया जाये क्योंकि उनकी आस्था पश्चिमी संस्थागत ढांचों के मानदंडों में फिट नहीं बैठती। हिंदू धर्म, ईसाई धर्म नहीं है। मंदिर, चर्च नहीं हैं। और संप्रदाय, ‘denomination’ नहीं हैं —कम से कम उस धर्मशास्त्रीय (theological) अर्थ में तो नहीं, जो अब्राहमिक परंपराओं पर आधारित है।
अनुच्छेद 26 अब किसी बंद फाटक की तरह नहीं रह सकता, जिसकी चाबी केवल कुछ गिने-चुने “विशेष” लोगों के पास हो। उसे अब संविधान की वह ढाल बनना होगा, जो हर उस भक्त की रक्षा करे —जो श्रद्धा, सत्य और धर्म की पगडंडी पर निष्ठा से चलता है। अब वक्त आ गया है कि हम इस अनुच्छेद की धूल जमी व्याख्या को फिर से लिखें, अपने अधिकारों की लौ फिर से जलाएँ, और यह सुनिश्चित करें कि हमारा संविधान भारत की आत्मा की बोली बोले, ना कि किसी बीते हुए साम्राज्य की उधारी ज़ुबान। यह सिर्फ क़ानून की बात नहीं — यह सभ्यता की पुनर्स्मृति है, आत्मा की पुकार है।
